*“रामो विग्रहवान् धर्मः”* — प्रभु श्री राम स्वयं धर्म का साकार अवतार हैं।
उन्हीं की दिव्य मर्यादा, अटल सत्यनिष्ठा, अद्भुत करुणा और अलौकिक शौर्य से मानव जीवन की नौका संसार-सागर को पार करती है।
इसी दिव्य विचारधारा को धारण कर यह समिति समाज में *धर्म, संस्कार, मर्यादा, सेवा, करुणा, शील और सत्य का प्रकाश* पुनः स्थापित करने का प्रण लेती है।
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शास्त्र, रामायण, चरित्र-निर्माण, नैतिकता, संस्कृति और जीवन-मूल्यों पर सार्थक विचार-विमर्श।
प्रत्येक सदस्य अपना स्वयं रचित भजन, कीर्तन, स्तुति या काव्य प्रस्तुत करे। यह संगीत नहीं—यह *अन्तर्यात्रा का पुल* है।
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