
रामलीला केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, धर्म और जीवन मूल्यों की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह वह पावन माध्यम है जिसके द्वारा मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाया जाता है। सत्य, धर्म, प्रेम, त्याग और कर्तव्य—इन सभी मूल्यों का सार रामलीला में समाहित है।
मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि मैं पिछले 59 वर्षों से रामलीला से जुड़ा हुआ हूँ। श्री रामा कृष्णा ड्रामैटिक क्लब, फिरोजपुर शहर के माध्यम से मैंने रामलीला को न केवल मंच पर जिया है, बल्कि उसे अपने जीवन का उद्देश्य भी बनाया है। इन वर्षों में प्रभु श्रीराम की भूमिका लगभग 20 वर्षों तक निभाने का अवसर मिला, जो मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य और तपस्या रही है। श्रीराम का चरित्र मनुष्य को हर परिस्थिति में मर्यादा, संयम और धर्म के मार्ग पर चलना सिखाता है।
रामलीला के मंच पर मैंने माता सीता, भरत, राजा दशरथ, हरिश्चंद्र, विभीषण जैसी अनेक भूमिकाएँ भी निभाईं। प्रत्येक पात्र ने मुझे जीवन का एक नया पाठ पढ़ाया। आज भी मैं महर्षि नारद जी की भूमिका निभा रहा हूँ, जो यह संदेश देती है कि सत्य का प्रचार और धर्म का मार्गदर्शन ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है।
रामलीला के अतिरिक्त सामाजिक नाटकों—जैसे देश दे राखे, शहीद-ए-वतन, अजीब मेहमान, ढाका जल रहा है और करनी का फल—में अभिनय कर समाज को जागरूक करने का प्रयास भी किया। कला का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना भी है।
मेरी रुचि संगीत, भजन, मोहम्मद रफ़ी जी के गीतों और ग़ज़ल गायन में रही है। संगीत आत्मा को शुद्ध करता है और मनुष्य को ईश्वर के निकट ले जाता है। यही भावना रामलीला के प्रत्येक संवाद और गीत में झलकती है।
मेरा उद्देश्य सदैव यही रहा है कि रामलीला के माध्यम से धार्मिक प्रचार-प्रसार, आपसी प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा मिले। जब तक जीवन है, तब तक प्रभु श्रीराम के आदर्शों को मंच और समाज के माध्यम से आगे बढ़ाने का प्रयास करता रहूँगा।
अंत में, मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि रामलीला की यह पावन परंपरा सदैव जीवित रहे और आने वाली पीढ़ियाँ भी इससे प्रेरणा लेकर धर्म, सत्य और प्रेम के मार्ग पर अग्रसर हों।
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