श्री कन्हैया लाल विश्वकर्मा

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श्री कन्हैया लाल विश्वकर्मा

श्री कन्हैया लाल विश्वकर्मा

(के. एल. विश्वकर्मा)

जन्म तिथि एवं जन्म स्थान
1 जनवरी 1959, मानिकपुर, जनपद प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश

वर्तमान निवास
हाउस नंबर 241, सारंगपुर, चंडीगढ़

पिता का नाम
स्वर्गीय श्री कामता प्रसाद विश्वकर्मा

वैवाहिक स्थिति
विधुर


शिक्षा

शैक्षणिक योग्यता : इंटरमीडिएट
विद्यालय : इंटरमीडिएट कॉलेज, मानिकपुर, प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश


पेशेवर एवं कलात्मक परिचय

श्री कन्हैया लाल विश्वकर्मा विगत लगभग पाँच दशकों से रामलीला एवं रंगमंच के क्षेत्र में सक्रिय, समर्पित एवं प्रतिष्ठित कलाकार हैं। उन्होंने अभिनय एवं निर्देशन—दोनों क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है।

व्यवसाय / कार्य क्षेत्र
अभिनेता एवं निर्देशक
कार्य क्षेत्र : रामलीला
अनुभव : 48 वर्ष (1977 से वर्तमान तक)


प्रमुख उपलब्धियाँ

  • केंद्रीय रामलीला महासभा प्रतियोगिता, 1999 में
    सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक एवं प्रथम पुरस्कार से सम्मानित


पुरस्कार एवं सम्मान

  • कला रत्न पुरस्कार — श्रीराम सेवक युवा कला मंच, चंडीगढ़ (मार्च 2023)

  • लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड — जन सेवा वेलफेयर सोसाइटी, चंडीगढ़ (अक्टूबर 2024)

  • लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड — श्री राम उत्सव कमेटी एवं बग्गा परिवार, चंडीगढ़ (नवंबर 2024)


प्रमुख भूमिकाएँ एवं विशेष पहचान

श्री विश्वकर्मा ने रामलीला में अब तक कम से कम 15 विभिन्न पात्रों का सशक्त अभिनय किया है। इनमें प्रमुख हैं—

  • महाराज दशरथ

  • पवनपुत्र हनुमान जी

  • श्री परशुराम जी

  • निषादराज केवट

विशेष रूप से निषादराज केवट की भूमिका उन्होंने लगभग 25 वर्षों तक निभाई है। वर्तमान समय में भी वे महाराज दशरथ एवं केवट की भूमिकाओं में सक्रिय हैं।

इसके अतिरिक्त, वे लगभग 30 वर्षों से युवा विकास रामलीला एवं दशहरा कमेटी, धनास (चंडीगढ़) में निर्देशन का दायित्व सफलतापूर्वक निभा रहे हैं।


कला, रुचियाँ एवं विशेषताएँ

कला रुचियाँ :

  • मंच सज्जा (सेट निर्माण)

  • नाट्य-लेखन एवं स्क्रिप्ट लेखन

विशेषता :

  • प्रभावशाली संवाद अदायगी

  • कुशल निर्देशन

अन्य रुचियाँ :

  • रामलीला एवं सनातन साहित्य से संबंधित पुस्तकों का अध्ययन


उद्देश्य एवं विचार

श्री कन्हैया लाल विश्वकर्मा का जीवन-उद्देश्य सनातन धर्म का उत्थान तथा मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के आदर्शों को समाज में स्थापित करना है। उनका विश्वास है कि प्रभु श्रीराम द्वारा बताए गए मार्ग का अनुसरण कर समाज को नैतिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाया जा सकता है।

वे विशेष रूप से युवा पीढ़ी को सनातन धर्म के मूल्यों से जोड़ने, रामकथा के माध्यम से संस्कारों का संचार करने एवं भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने हेतु सतत प्रयासरत हैं।

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